Today Wednesday, 25 March 2026

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धर्म बदला तो आरक्षण फिसला


दिल्ली:
दलित या पिछड़ी जातियों में धर्म परिवर्तन का मामला पिछले कई दशकों से सुर्ख़ियों में रहा है जिसके के लिए केंद्र सरकार भी अपने वोट बैंक के चक्कर में कभी भी इस ओर ध्यान नहीं दिया लेकिन देश की माननीय उच्चतम न्यायलय ने इस बारे में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि इन जातियों से सम्बंधित कोई भी व्यक्ति यदि धर्मांतरित होता है तो उसके धर्मांतरण के साथ ही उसका आरक्षण का दर्जा अपने आप रद्द हो जायेगा और जस्टिस पी.के. मिश्रा और एन.वी. अंजारी की बेंच ने फैसला सुनाते समय आगे कहा कि ईसाई या अन्य मजहब में धर्मांतरित  होने वाला दलित व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम का लाभ नहीं ले सकेगा क्योंकि वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह जाता एवं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध को छोड़कर किसी भी धर्म का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति एससी का दर्जा का दावा नहीं कर सकता है इसलिए वह आरक्षण का हकदार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि SC का दर्जा उन ऐतिहासिक सामाजिक कमजोरियों से जुड़ा है जिसकी जड़ें खास धार्मिक ढांचों में हैं और ईसाई धर्म में धर्मांतरण करने से जाति-आधारित यह कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त सुरक्षा अपने आप खत्म हो जाती हैं।

यह फ़ैसला उन लाखों दलित ईसाइयों और मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ा झटका है, जिनका तर्क यह है कि जब वे अपना धर्म बदलते हैं, तो उनकी सामाजिक और आर्थिक "पिछड़ापन" कोई जादू से गायब नहीं हो जाता इसलिए धर्मांतरित व्यक्ति का आरक्षण ख़त्म नहीं करना चाहिए लेकिन अदालत ने असल में यह कहा कि  एक सामाजिक श्रेणी (जाति) को एक धार्मिक श्रेणी से सख्ती से जोड़कर उसका लाभ लेना अनुचित है इसलिए कानून आपकी पहचान की रक्षा तभी करेगा, जब आप "भारतीय" धार्मिक दायरे के भीतर रहेंगे। आनंद जैसे किसी पादरी के लिए, इसका मतलब यह है कि वह पहले जैसा जाति-आधारित दुर्व्यवहार नहीं झेल रहा है, लेकिन फिर भी वह बपतिस्मा करके दलितों के लिए उपलब्ध सबसे मज़बूत कानूनी सुरक्षा कवच का इस्तेमाल कर रहा है जो कि देश के कानून का सरासर उलंघन है।
 
कई लोगों ने सवाल उठाया कि लाखों-करोड़ों धर्मांतरित ईसाई सिस्टम को धोखा देने के लिए हिंदू नामों के साथ 'क्रिप्टो ईसाई' बनकर रह रहे हैं फिर इसे कैसे नियंत्रित किया जाएगा तो इसके लिए कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति धर्मांतरित हुआ था और अब वह SC/ST का दर्जा वापस पाने के लिए हिंदू धर्म में लौटना चाहता है, तो समुदाय की मंजूरी (Community Acceptance) के बिना वह ऐसा नहीं कर सकता है जिसकी तीन ज़रूरी शर्तें हैं:
  • इस बात का साफ सबूत कि वह व्यक्ति असल में (Originally) किसी नोटिफाइड अनुसूचित जाति से जुड़ा था।
  • अपने मूल धर्म में सच्ची वापसी, और जिस धर्म को अपनाया था, उसे पूरी तरह से छोड़ देना।
  • अपनी मूल जाति/समुदाय द्वारा स्वीकार किया जाना।
  • सिर्फ़ खुद से किया गया ऐलान (Self-declaration) काफ़ी नहीं है। 

कोर्ट ने कहा कि उपर्युक्त तीनों शर्तें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं और इस बात को साबित करने की ज़िम्मेदारी (Burden of Proof) पूरी तरह से उस व्यक्ति पर होगी जो धर्म में वापसी करने का दावा कर रहा है और उसको धर्म में वापसी के दावों को पुख्ता करने के लिए सख्त कानूनी जांच से गुजरना होगा। कोर्ट ने आगे कहा कि  संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के तहत, अनुसूचित जाति का दर्जा सिर्फ़ उन लोगों तक सीमित है जो हिंदू धर्म को मानते हैं, और बाद में इसे सिखों (1956) और बौद्धों (1990) तक बढ़ाया गया लेकिन ईसाइयों या मुसलमानों तक नहीं है। 

कई सामाजिक धुरंधरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट फैसला बहुत ही बढ़िया सुनाया है लेकिन अब सारा दारोमदार केंद्र सरकार पर है कि वह कैसे कोर्ट के फैसलों को दूसरे राज्यों में लागू कराती है और इसको लागू करने के लिए केंद्र सरकार को सबसे ज्यादा दक्षिण के राज्यों में कड़ी मशक्क्त करनी पड़ेगी क्योंकि वहां कई सरकारें धर्मांतरण के कारोबार में सीधे सीधे लिप्त पाई गई हैं। 

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