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गुमनामी बाबा के तथ्यों पर एक नजर
18 अगस्त 1945 - भारतीय राष्ट्रवादी सुभाष चंद्र बोस की कथित तौर पर ताइवान में एक विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
80 साल बाद भी, न तो कोई शव मिला है, न ही कोई निर्णायक सबूत, और न ही कोई निष्कर्ष।
महापुरुष का उदय:
भारतीय सिविल सेवा छोड़ने से लेकर ब्रिटिश राज से लड़ने के लिए आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन करने और कांग्रेस अध्यक्ष बनने तक, सुभाष चंद्र बोस ने भारत के लिए एक भीषण युद्ध लड़ा।
उनका युद्धघोष था: 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।'
अंतिम उड़ान
18 अगस्त: जापानी रिकॉर्ड के अनुसार, ताइपे में उड़ान भरते समय उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। वे गंभीर रूप से जल गए और उसी रात उनकी मृत्यु हो गई।
कथित तौर पर उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया; अस्थियाँ टोक्यो के रेंकोजी मंदिर भेज दी गईं।
लेकिन लाखों लोगों में संदेह व्याप्त हो गया।
सबूत गायब:
कोई शव चित्र नहीं। कोई पोस्टमार्टम नहीं। कोई भारतीय प्रत्यक्षदर्शी नहीं।
बोस के साथ गए आईएनए के हबीब उर रहमान ने दुर्घटना के गवाह होने का दावा किया।
बाद में ताइवान ने दावा किया कि उस दिन कोई विमान दुर्घटना नहीं हुई थी।
अटकलें बढ़ती गईं, रहस्य गहराता गया, और संदेह कभी खत्म नहीं हुआ।
1 सिद्धांत: गुमनामी बाबा का रहस्य
फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश।
एक संत गुप्त रूप से रहते थे।
बोस परिवार की तस्वीरें, आईएनए मेडल, जर्मन दूरबीनें, आवाज़, आदतें - अजीब तरह से मिलती-जुलती थी।
डीएनए और हस्तलेखन परीक्षण? आंशिक मिलान, लेकिन अनिर्णायक रहे।
सिद्धांत 2: सोवियत संघ से पलायन
एक अन्य सिद्धांत यह है कि बोस सोवियत संघ भाग गए, जहाँ उन्हें सुरक्षा प्रदान की गई।
कुछ लोगों का मानना है कि वे शीत युद्ध की राजनीति में शामिल हो गए थे।
सोवियत अभिलेखों में रूस में एक उच्च-स्तरीय भारतीय व्यक्ति का संकेत मिलता है, लेकिन कोई भी निश्चित रूप से बोस की पहचान नहीं करता है।
सिद्धांत 3: दक्षिण-पूर्व एशिया से पलायन
कई लोगों का मानना है कि दुर्घटना के बाद बोस दक्षिण-पूर्व एशिया भाग गए थे।
अपुष्ट खबरो के अनुसार जापान, इंडोनेशिया और थाईलैंड में देखे गए और यहां से यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि वे किसी छद्म पहचान के साथ जीवित रहे।
भारत की जाँच
1956 - शाह नवाज़ समिति - दुर्घटना सिद्धांत को स्वीकार किया
1970 - खोसला आयोग - वही निष्कर्ष
2005 - मुखर्जी आयोग - दुर्घटना की कहानी को खारिज किया, गुमनामी बाबा पर अनिर्णायक।
अवर्गीकृत फ़ाइलें
2015–17: भारत सरकार ने 300 से ज़्यादा फ़ाइलें सार्वजनिक कीं
खुलासा: नेहरू सरकार ने दशकों तक बोस के परिवार की जासूसी की।
लेकिन उनके से हुई दुर्घटना पर कोई निर्णायक जवाब नहीं दिया।
ब्रिटिश और सोवियत अभिलेखागार — अभी भी गोपनीय।
एक लापता व्यक्ति की विरासत
आई.एन.ए. मुक़दमों (1945-46) ने ब्रिटिश भारत को हिलाकर रख दिया था।
के.एस. सुदर्शन के तथ्य :-
पूर्व आरएसएस प्रमुख के.एस. सुदर्शन जी के बयान नेताजी सुभाष बोस की मृत्यु या गुमनामी बाबा पर एक अलग तथ्य उजागर कर रहे हैं।
1. ताइवान विमान दुर्घटना एक अफवाह थी।
2. एस राधाकृष्णन और विजयलक्ष्मी पंडित 1949 में मास्को में नेताजी से मिले।
3. नेता जी 1954 में वापस आये और 16 सितम्बर 1985 तक गुमनामी बाबा के रूप में अयोध्या में रहे।
4. नेताजी का निधन 16 सितंबर 1985 को अयोध्या में हुआ।
5. नेताजी चीजों को इस तरह समझाते और भविष्यवाणी करते थे जैसे सब कुछ उनके सामने हो रहा हो।
6. अब यह साबित हो गया है कि नेताजी सुभाष बोस और गुमनामी बाबा की लिखावट एक जैसी है।
7. हमें गलत इतिहास पढ़ाया गया है।
फ़िल्में और किताबें उन्हें भारतीय कल्पना में जीवित रखती हैं। जीवित हों या मृत, बोस ने एक ऐसे भारत का निर्माण किया जिसने घुटने टेकने से इनकार कर दिया।
ऐसे साहसी पुण्य आत्मा की अनुपस्थिति में भी, बोस का भारत के लिए साहसी, स्वतंत्र और जीवंत विचार है।
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