मध्य प्रदेश :
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डबल बेंच ने राजा भोज की तपोभूमि और माँ सरस्वती की आराधना से जुड़ी धार की ऐतिहासिक भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद विवाद पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित परिसर को हिंदू मंदिर (वाग्देवी सरस्वती मंदिर) घोषित कर दिया है औरअदालत ने एएसआई (ASI) के पुराने आदेश को रद्द कर दिया और हिंदू पक्ष को वहां पूजा करने का पूर्ण अधिकार दे दिया है और इस केस में हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को मंदिर भी घोषित किया है और अब ऐसा माना जा रहा है कि कोर्ट के इस फैसले से लम्बे समय से चल रहे इस विवाद पर पूर्ण विराम लग जाएगा क्योंकि हिन्दू पक्ष की अगुवाई में पिता पुत्र विष्णु शंकर जैन एवं हरी शंकर जैन की टीम ने जो ऐतिहासिक तथ्यों एवं मंदिर प्रांगड़ में मिले ठोस ASI आधारित प्रमाणों और साक्ष्य को कोर्ट के सामने रखा उससे कोर्ट प्रभावित होकर अपना कानूनी फैसला हिन्दू पक्ष की तरफ सुनाया है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के निर्णय के तुरंत बाद हिन्दू जनमानस में उत्साह की लहर दौड़ पड़ी और भोजशाला स्थल पर श्रद्धालुओं द्वारा पूजा-अर्चना की जा रही है क्योंकि अदालत ने अपने आदेश में भोजशाला को देवी वाग्देवी सरस्वती मंदिर के रूप में साफ़ साफ़ उल्लेखित किया है और इस समय प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है। इस बीच मुस्लिम समुदाय ने भी इस मंदिर में शुक्रवार की अपना आखिरी नमाज भी पढ़ी क्योंकि इसके बाद कोर्ट ने साफतौर पर मुस्लिम समुदाय को वाग्देवी सरस्वती मंदिर में जाने पर रोक लगा दी है।
इस फैसले पर हिंदू जनमानस में ख़ुशी की लहर है और इसको सच्चाई की जीत बता रहे हैं और वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय इस फैसले नाखुश दिखाई दे रहा था और कहा कि कोर्ट ने ASI के 2003 के फैसले को रद्द करने के साथ साथ केंद्र सरकार दवरा पारित worship Act 1995 को भी पूरी तरह नजरअंदाज किया है जो कि सही नहीं है इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे और वहां अपना पक्ष रखेंगे। राजनितिक पार्टियों में बीजेपी का कहना है कि साक्ष्य एवं सबूतों के आधार पर कोर्ट ने भी माना है कि यह सच में यह वाग्देवी सरस्वती मंदिर ही है जो हम पिछले कई वर्षों से कह रहे हैं और यह सच्चाई भी है तथा कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि वहां पर यूनिवर्सिटी और अस्पताल बनवाया जाए जिससे सभी को रोजगार मिल सके।
ऐतिहासिक तथ्यों की बात करें तो कमाल मौला मस्जिद (भोजशाला परिसर): मूल रूप से यह 11वीं सदी का एक सरस्वती मंदिर था, जिसे परमार राजा भोज ने बनवाया था, मालवा सल्तनत के शुरुआती दौर में इसे आंशिक रूप से तोड़कर एक मस्जिद में बदल दिया गया था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 1937 से 1942 के बीच जब हिंदू और मुसलमानों के बीच विवाद हुआ था, तब धार स्टेट के तत्कालीन राजा ने मुसलमानों को नमाज पढ़ने के लिए बख्तावर मार्ग पर मस्जिद के लिए स्थान दे दिया था, जहां पर आज भी रहमत मस्जिद मौजूद है और राजा के द्वारा दी गई रहमत के कारण ही इसे रहमत मस्जिद का नाम दिया गया था फिर अब सोचिए कि भोजशाला के बदले में मुसलमानों को पहले ही मस्जिद मिल चुकी थी, लेकिन इसके बाद भी इन्होंने फिर से भोजशाला पर दावा ठोक दिया और हिंदुओं को अपना मंदिर पाने के लिए कोर्ट में चप्पलें घिसनी पड़ी।
फैसले के मुख्य बिंदु:
- माँ सरस्वती की मूर्ति लगाई जाएगी।
- ASI भोजशाला का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में लेगा।
- भक्तों को पूजा करने का पूरा अधिकार, नमाज़ पढ़ने की इजाज़त रद्द किया गया।
- अगर मस्जिद के लिए अलग जमीन मांगी जाती है, तो सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।
- माँ वाग्देवी सरस्वती की असली मूर्ति इंग्लैंड के म्यूजियम से मंगवाई जाए।