दिल्ली :
दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आम आदमी पार्टी के केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक, विनय मिश्रा के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का आदेश देते हुए ख़ुद को शराब से संबंधित आबकारी घोटाले के केस से अलग भी कर लिया है क्यूँकि कानूनी तौर पर अवमानना शुरू करने वाला जज केस का हिस्सा नहीं हो सकता है। कणों के हिसाब से एक बार जब कोई जज कंटेम्प्ट प्रोसीडिंग्स शुरू करता है, तो उस जज को मुख्य केस की सुनवाई जारी नहीं रखनी चाहिए, इसलिए एक्साइज पॉलिसी केस चीफ जस्टिस के ऑर्डर के तहत दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया जाएगा जबकि केजरीवाल यही चाहते भी थे और वह जानते हैं कि क्रिमिनल कंटेम्प्ट केस में ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा? उन्हें ज्यादा से ज्यादा 6 महीने की साधारण जेल या ₹2000 का फाइन या दोनों हो सकते हैं लेकिन इससे उन्हें कुछ खास फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें जेल में रहने की आदत है इसलिए इतने कड़क और ईमानदार जज को केस से हटाने के लिए 6 महीने जेल कटना उनके लिए कुछ भी नहीं हैं।
दिल्ली के एक पुराने अवैध शराब नीति मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक और बदनाम करने वाली बातें पोस्ट की गईं हैं और ऐसे में वह चुप नहीं रह सकतीं हैं और आप कोर्ट में केस लड़ सकते हैं, लेकिन आप सोशल मीडिया पर कोर्ट को ही बदनाम करके चुप्पी की उम्मीद नहीं कर सकते इसलिए "अगर आप कोर्ट को बदनाम करते हैं, तो कोर्ट के पास ऐसे हथियार हैं जिनका वह इस्तेमाल करेगा क्योंकि निष्पक्ष आलोचना और अवमानना के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है जिसको सभी को समझना पड़ेगा।" कोर्ट के इस कठोर कार्यवाई से यह साफ़ सन्देश जाता है कि कोई भी, चाहे वह कितना भी ताकतवर हो या कितनी भी ज़ोर-शोर से खुद को ‘आम आदमी’ कहने का दावा करे, कानून या ज्यूडिशियरी की इज्ज़त से ऊपर नहीं है।
वैसे भी जब जब आम आदमी पार्टी के नेताओं पर कोई भी घोटाले के आरोप लगते हैं तो पार्टी के नेता उस घोटाले की जांच करने वाले अधिकारियों या संस्थानों पर ही कूटनीतिक हमला करके बदनाम करते हैं इस केस में भी काफ़ी समय से, दिल्ली, पंजाब और पूरे देश के लोग देख रहे हैं कि AAP नेताओं ने कैसे जाने-माने जजों और खुद ज्यूडिशियरी को टारगेट करते हुए झूठ, एडिटेड वीडियो, बदनाम करने वाले लेटर और सोशल मीडिया पर हमलों का एक सिस्टमैटिक और बुरा कैंपेन चलाया है और यह जानबूझकर उस कॉन्स्टिट्यूशनल इंस्टीट्यूशन को डराने और बदनाम करने की कोशिश है जो हमारी डेमोक्रेसी की नींव है और उसे बनाए रखती है और जबकि जज के सामने प्रधानमंत्री तक बहुत सम्मान से झुकते हैं लेकिन आप नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और सरकार, कोर्ट और दूसरी संस्थाओं की बुराई करते हैं और इस कार्रवाई से एकदम साफ़ सन्देश दिया गया कि अच्छा बर्ताव करें और अच्छा होने का नाटक न करें।
आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल ने खुद और साथ में अन्य के खिलाफ 'आपराधिक अवमानना' (Criminal Contempt) के नोटिस जारी होने पर कहा कि सत्य की जीत हुई! , गांधी जी के सत्याग्रह की एक बार फिर जीत हुई। लेकिन कुछ भी हो किसी भी न्यायमूर्ति पर पक्षपाती होने का आरोप लगाना संविधान का मखौल उड़ाने के साथ साथ यदि ऐसी परंपरा आगे चल पड़ी तो लोग कानून पर भरोसा नहीं करेंगे।