Today Friday, 10 April 2026

/ समाचार / राष्ट्रीय

​यूरेनियम नहीं, भारत थोरियम से एनर्जी में करेगा खेला


72 साल के इंतजार के बाद भारत ने एक अहम पड़ाव पार कर लिया है और भारतीय वैज्ञानिकों ने 7 अप्रैल 2026 को इतिहास रच दिया, जिससे भारत सैकड़ों सालों के एनर्जी आपूर्ति के लिए एनर्जी इंडिपेंडेंस के एक कदम और करीब आ गया वैसे अब तक हमेशा यही सवाल रहता था कि क्या यूरेनियम की जगह थोरियम ले पाएगा लेकिन अब इस सवाल का हल हमारे भारतीय वैज्ञानिकों ने ढूंढ निकाला है। परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में भारत का दूसरे चरण में प्रवेश करना एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि है। लेकिन क्या भारत को बिजली उत्पादन में कोयले और हाइड्रो जैसे पारंपरिक स्रोतो से छुटकारा मिल पाएगा? इसका जवाब में एक्सपर्ट का कहना है कि भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ी मात्रा में थोरियम रिजर्व है जो भारत को आनेवाले सौ सालों में थोरियम का इस्तेमाल करने की दिशा में मदद करेगा और भविष्य की एनर्जी के लिए अपना फ्यूल भी बना सकता है।

कलपक्कम में भारत का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) “क्रिटिकैलिटी” पर पहुँच गया है। इसका मतलब है कि रिएक्टर ने कंट्रोल्ड न्यूक्लियर रिएक्शन सफलतापूर्वक शुरू कर दिया है। यह एक बहुत महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि भारत अब अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम के स्टेज 2 में पहुँच गया है जिसमे रिएक्टर मौजूदा मटेरियल को नए फ्यूल में बदलकर ज्यादा फ्यूल बना सकता है। अगला स्टेज 3 है और यहीं पर भारत थोरियम के साथ एनर्जी का खेल बदल देता है और महान वैज्ञानिक डॉ. होमी भाभा के सोचे हुए प्रोजेक्ट "अक्षयपात्र"  के सपनों को साकार कर देता है और रूस के बाद ऐसा करने वाला भारत सिर्फ़ दूसरा देश बन गया है। 

अक्षयपात्र प्रोजेक्ट क्या है :
भारत के पास सबसे बड़ा थोरियम रिजर्व है लेकिन यूरेनियम रिज़र्व कम है। हालांकि सभी न्यूक्लियर पावर प्लांट यूरेनियम का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उन्होंने बिजली बनाने के लिए मौजूद बड़े थोरियम रिजर्व का इस्तेमाल करने का सोचा था।
  • एक ऐसा सिस्टम बनाएं जहां बायप्रोडक्ट को उसी या दूसरे स्टेज के लिए इनपुट फ्यूल के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। 
  • ज़ीरो न्यूक्लियर वेस्ट, इसलिए इसके डिस्पोजल की कोई प्रॉब्लम नहीं। 
  • एक सेल्फ जेनरेटिंग साइकिल बनाएं जो आने वाले 100 सालों तक कम कीमत पर, दूसरे देशों पर बिना किसी निर्भरता के पावर दे सके।
  • थोरियम को बिजली बनाने के लिए यूरेनियम 233 की ज़रूरत होती है। नेचुरल यूरेनियम 238 को U 233 में बदलने के लिए बहुत महंगे प्रोसेस से गुज़रना पड़ता है। इसलिए, दूर की सोचने वाले डॉ. होमी भाभा ने इस प्रोसेस में 3 स्टेज डिज़ाइन किए, जिन्हें अक्षयपात्र कहा जाता है। 
इसको समझने का एक आसान तरीका यह है:
पहला स्टेज - प्रेशराइज़्ड हेवी वॉटर रिएक्टर (PHWR)
  • बिजली बनाने के लिए नैचुरल यूरेनियम का इस्तेमाल करें।
  • सिर्फ़ 0.7% बिजली बनाने के लिए इस्तेमाल होता है और बाकी सब बड़ी मात्रा में प्लूटोनियम और कुछ डिप्लीटेड यूरेनियम में बदल जाता है।
  • पहला रिएक्टर 1972 में चालू हुआ था।

भारत में 18 PHWR (14 - 200MWe और 4 - 700MWe) चल रहे हैं, जिनकी कुल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 6,780 MW है और 700 MWe के 10 और बनाए जा रहे हैं। "अक्षयपात्र" के लिए कम से कम 500MWe रिएक्टर ज़रूरी हैं।

स्टेज 2 - फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)
  • रूस के बाद भारत कमर्शियल न्यूक्लियर ब्रीडर बनाने वाला दूसरा देश बन गया
  • कई दूसरे देशों ने कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए।
  • 1 00% देसी टेक्नोलॉजी है। 
  • 200 से ज़्यादा कंपनियों के पार्ट्स और टेक शामिल हैं। 
  • अब यह सुपर साइंस है। "ब्रीडर" शब्द इस बात से आया है कि रिएक्टर बिजली बनाने के दौरान जितना न्यूक्लियर फ्यूल इस्तेमाल करता है, उससे ज़्यादा बनाने के लिए फास्ट न्यूट्रॉन का इस्तेमाल करता है। इस फ्यूल का इस्तेमाल आगे बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है।

ब्रीडर:
  • स्टेज 1 से प्लूटोनियम और यूरेनियम बायप्रोडक्ट और थोरियम का इस्तेमाल करता है। 
  • स्टेज 1 रिएक्टर से 125 गुना ज़्यादा बिजली बनाता है। 
  • प्लूटोनियम और यूरेनियम 233 भी मिलता है।
  • स्टेज 2 में प्लूटोनियम और स्टेज 3 में U 233 का दोबारा इस्तेमाल होता है।
  • ज़ीरो वेस्टेज।

स्टेज 3 - मोल्टेन सॉल्ट ब्रीडर (IMSBR)
  • स्टेज 2 से यूरेनियम 233 + थोरियम मिलाने पर स्टेज 3 से 6.2 गुना ज्यादा बिजली बनती है (स्टेज 1 से 850 गुना ज़्यादा)
  • U 233 मिलता है। इसे फिर से स्टेज 3 में भेजा जाता है - फिर से ज़ीरो न्यूक्लियर वेस्टेज।
  • BARC एक प्रोटोटाइप पर काम कर रहा है।
Source : विशाल उपाध्याय 
 
 

Related Articles

Designed & Maintained by Webxces

© 2025 | News WiFi